कुँड़ुख़ (उरांव) भाषा का इतिहास, विकास, संवैधानिक मान्यता और इसका महत्व
तोलोंग सिकि (Tolong Siki), भारतीय आदिवासी आंदोलन एवं झारखंड के छात्र आंदोलन की एक प्रमुख देन है। यह लिपि मुख्य रूप से कुँड़ुख़ (उरांव) भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए विकसित की गई है।
इतिहास और विकास
जनक एवं सहयोगी: इस लिपि को झारखंड के डॉ. नारायण उरांव ने मैसूर स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज (CIIL) के पूर्व निदेशक फ्रांसिस एक्का, डॉ. रामदयाल मुंडा (रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति) और निर्मल मिंज के सहयोग से तैयार किया।
विकास का सफर: 1989 में डॉ. उरांव ने कुँड़ुख़ भाषा के लिए पृथक लिपि बनाने का संकल्प लिया। यह लिपि 15 मई 1999 को आधिकारिक रूप से प्रकाशित हुई तथा उसी वर्ष इसे प्राथमिक विद्यालयों में शुरू किया गया।
संवैधानिक एवं शैक्षणिक मान्यता
राज्यस्तरीय स्वीकृति: झारखंड सरकार एवं कुँड़ुख़ समाज ने इसे आधिकारिक मान्यता दी है। कार्मिक एवं राजभाषा विभाग द्वारा 18.09.2003 को इसे संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने हेतु अनुशंसित किया गया।
शैक्षणिक प्रयोग: वर्ष 2009 से झारखंड में मैट्रिक परीक्षा में कुँड़ुख़ भाषा विषय की परीक्षा इसी लिपि में आयोजित की जा रही है। वर्तमान में इसे कुरुख लिटरेरी सोसाइटी द्वारा प्रचारित किया जा रहा है।
यूनिकोड मान्यता: यूनिकोड कंसोर्टियम द्वारा इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति प्रदान की गई है। यूनिकोड स्टैंडर्ड के संस्करण 17.0 में इसके लिए U+11DB0 से U+11DEF तक का विशेष कोड ब्लॉक आवंटित किया गया है।
नई लिपि की आवश्यकता क्यों?
मातृभाषा का संरक्षण: आधुनिकता और रोजगार की दौड़ में हिंदी और अंग्रेजी के अत्यधिक प्रयोग से जनजातीय भाषाएं विलुप्ति की कगार पर पहुंच रही हैं।
भाषा की मौलिकता: कुँड़ुख़ भाषा की ध्वनि और प्रकृति देवनागरी या रोमन लिपि से भिन्न है। इसलिए, अपनी लिपि के बिना इसकी मूल अभिव्यक्ति को अक्षुण्ण रखना कठिन था।
सांस्कृतिक एवं वैश्विक पहचान: तोलोंग सिकि से उरांव संस्कृति का विकास होगा और प्राथमिक शिक्षा व रोजगार से जुड़ने पर युवाओं का जुड़ाव बढ़ेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
उरांव जनजाति द्वारा किस भाषा का प्रयोग किया जाता है?
उरांव जनजाति द्वारा मुख्य रूप से कुँड़ुख़ भाषा का प्रयोग किया जाता है।
कुँड़ुख़ भाषा कहाँ बोली जाती है?
भारत में यह भाषा मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल राज्यों में उरांव जनजातियों द्वारा बोली जाती है।
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